बदमाश लौंडे कवि -विनय भारत

उसको देखा तो लगा मानो मंजिल है यही

उसकी सहेली को देखा तो लगा मानो मंजिल है वही

तीसरी को देख प्यार हो जाता है

चौंथी का घर हमें अपना ससुराल नजर आता है

पाँचवी की माँ हमें अपनी सास नजर आती है

हर मोड़ पर लडकों की मुमताज़ बदल जाती हैं!

कवि – विनय ‘भारत’