गजल- अश्कोँ का पानी

वो हम पर सितम पे सितम ढाते गये
और मै मुस्कुराकर सहता गया!
मेरी जिँदगी के हर लम्होँ मेँ
मेरे अरमानोँ का खून बहता गया!
कभी अपनोँ से तो कभी तो गैरोँ से
गमकोश ताने सुनता गया!
दुनिया वालोँ की नजरोँ मेँ मै
एक बेकार जर्जर मकाँ था,
जो दिन पे दिन ढहता गया!
हाय! उन्हे भी न दु:ख हुआ “रमाकाँत “मेरी कुर्बानियोँ का,
जिसके लिये दिन रात मै अश्कोँ का पानी पीता गया!