ख़्याल तुम्हारा

बीती शब जागता रहा
बंद दरीचे से झांकता रहा

नजरों की जंग खाई कैंची से
अपने हिस्से का आसमां काटता रहा

इक टूटता तारा टिमटिमाती सूरत से
दिल की मायूसी को ढांकता रहा

उसी सवाल ने आकर घेर लिया
जिससे सारी उम्र भागता रहा

खींच ली आँखों पे पलकों की सरहद
फिर भी ख़्याल तुम्हारा उसे लाँघता रहा