गजल- दिल पर जख्म देकर

दिल पर जख्म देकर
वो अपने शहर को जाने लगे है!
जो आँधियोँ मेँ भी न बुझे
गम का ऐसा दीप जलाने लगे है!
जब हमने पूछा-हमारी आँखो से
अब और कितने आँसू बहेँगे,
हँसकर वो समुँदर को दिखाने लगेँ हैँ!
मेरा साथ छोडकर जब वो साथ पाये रकीबोँ का,
कहने लगे “रमाकाँत” मेरे तीर ठीक निशाने पे लगे हैँ!