सहचरी प्रतिपादित

तुमने इस बिखरे दिल में
आलोक सा जगा दिया
प्रिय इस अकिंचन को
कुबेरे जहां बना दिया

तुम द्रवित सी होकर
घुल गई हो जीवन में
कंचन सी उजली परि
उत्तर गई हो स्वप्न में

नाजुकता संग लघुता लाकर
दिया बहुत प्यार मुझे
प्रिय तेरा कृतधनी हूँ
जो माना भरतार मुझे

कोमल सी एक बेल समर्पित
लिपटी रहती हो उपवन में
प्रिय तुम एक अधजल घघरी
छलकती रहती हो मन में

कदम बढाकर तुमने अपने
मुझे नया आयाम दिया
कोमल उँगलियों से अपनी
जीवन मेरा थाम लिया

ना इल्म हुआ मुझे कभी
ना तुमने कभी तकरार किया
ना जरूरतों को जरुरत समझा
बस जी भरके प्यार किया

केशुओं में खुशी समेटे
होठ लावण्यता से भरे
यौवन की तुम धनि हो
मन बेचैन क्या काम करे

तुमबिन ये जगत
एक बिंदु सामान है
आदि को अंत से जोड़ता
तेरा मुझपर ध्यान है

ऋणी हूँ इस जीवन में
में तन्हा पाकर सहारा
तम को चीरता दीपक जैसे
लगे सुबह मुखड़ा तुम्हारा

तुम उषा जीवन की
सहचरी प्रतिपादित
देवत्व का वरदान लिए
मेरा जीवन किया सुशोभित

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