“माँता-पिता”

निर्गुण पिता – सगुण हैं माता।
वन्दनीय हैं दोनों – दोनो दाता॥
निर्गुण सगुण व्यक्ति को दाता।
मंत्र लिए बिनु पार न कोई पाता॥
परमहंस जी वैष्णव शास्त्र हैं गाते।
काली रूप में जो कृष्ण को पाते॥
ओ! ही जो वेदों को पढ़ने ડ जाते।
जो “ॐ” सचिदानन्द: व्रह्म: को पाते॥
तन्त्र -शास्त्र में जो- जो ध्यान लगाता।
“ॐ”सचिदानन्द:शिव:को वह ही भाता॥
पुराणों का सुगम पाठ जिसे जब भाता।
“ॐ” सचिदानन्द: कृष्ण: को वह पाता।
त्याग तपस्या तार में जो ध्यान लगाता।
अति व्याकुलता में ही प्रभु मिल जाता॥
चन्दा सी सीतल माता पिता सूरज आभा।
सदा विचारों की स्वतन्त्रता आँचल में आता॥

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