मन नहीं बदले अगर

मन नहीं बदले अगर तो सिर्फ तन से क्या ?

आये दिन के कीर्तन से या भजन से क्या ?

 

जो उजाला या तपिश कुछ भी न दे जाए

वह जले या बुझ भी जाए, उस अगन से क्या ?

 

बन्दिशें ही बन्दिशें जब हों उड़ानों पर

पंछियों को फिर परों से या गगन से क्या ?

 

आपके घर में हवा है और ताज़ा है

आपको माहौल की गहरी घुटन से क्या ?

 

ज़हनियत का भी पता देते हैं खुद कपड़े

ज़हनियत मर जाए तो फिर तन-बदन से क्या ?

 

जब गरीबों का कहीं कोई न अपना हो

मुल्क की सारी व्यवस्था से सदन से क्या ?

 

जो अँधेरों की तरफदारी में शामिल हो

वह किरन भी हो अगर तो उस किरन से क्या ?

Leave a Reply