अनुराग

कब से सोच रहा हूँ मैं, कुछ लिखने की शुरुआत करूँ
चंचल मन की चंचलता को, शब्दों में कैसे बयां करूँ

नित नए-नए जज़्बात मेरे मन को अभिरंजित करते हैं
जैसे बसंत की बेदी पर कई उपवन डेरा धरते हैं

कब मैंने ऐसा सोचा था की वो मुझको मिल जाएगी
मेरी बाँहों में सिर रखकर वो प्यार का गीत सुनाएगी

स्वप्न मेरा साकार हुआ तो मन में अभिलाषा जागी
सपनों से नाज़ुक हृद्दर्पण पर उसके प्रतिरूप की छवि लागी

उसकी हर मुस्कान मेरे दिल को स्पंदित करती है
उसके चेहरा का भोलापन स्वांसों पे पहरा करती है

कोई छुपा हुआ अरमान लिए अंतर्मन में मुस्कान लिए
फिर देख के मुझको शरमाना कुछ कहते कहते रुक जाना

अनभिज्ञ चपल सी माया कर अपने केशों की छाया कर
वो पास मेरे चली आती है मेरे मन को भरमाती है

अपनी निश्छल बातों से वो कानों में रस भर जाती है
अपने हांथों की कंघी से मेरे बालों को सुलझाती है

कुंदन सी काया में लिपटी लज्जा की चादर में सिमटी
फिर प्यार भरे नयनों से वो मेरा आलिंगन करती है

निःस्वार्थ प्रेम की मूरत बन मेरे तन मन में वो समा गयी
मेरा मुझमे कुछ भी न रहा मुझको मुझसे वो चुरा गयी

प्रसून सिंह “विभक्त”

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    • Prasoon Singh Prasoon Singh 21/06/2014

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