धड़कन

कुछ बात है इस धड़कन की जो रुक रुक कर कुछ कहती है
शायद ये उसकी हिचकी है जो हर पल याद इसी को करती है
इक दिन मैंने महसूस किया इस धड़कन में इक तड़पन है
जो भावशून्य इस चेहरे पर चिलखन सी पैदा करती है

मेरे ख्वाबों में आ आ कर रफ़्तार बढ़ा जाती है
अनसोई सूनी आँखों में इक कोर बना जाती है
सूखे पत्तों से होंठों पर बसंत फूल खिल जाते हैं
जब मेरे दिल की धड़कन को कुछ उसे सुनाकर आते हैं

एक दिन मेरी धड़कन को उसकी धड़कन ने याद किया
कुछ आँखों से कुछ बातों से उसने अपना पैगाम दिया

सुर्ख सजल नयनों से दो बूँद टपक कर गिरी कहीं
रुधे कंठ से शब्दों ने कानों में उसके कहा यही
दिल के सूने गलियारे में इक हूक सी पैदा होती है
जब तेरे दिल की धड़कन किसी और के लिए धड़कती है

प्रसून सिंह “विभक्त”

One Response

  1. rakesh kumar राकेश कुमार 21/06/2014

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