मन की अभिव्यक्ति

कह रहा वाचाल मन खुद को समर्पित कर मुझे
दीन दुनिया से परे लेकर मैं जाऊंगा तुझे
कर मेरा विश्वास साथी मैं तेरा अभिमान हूँ
तू फंसा है किस भंवर में मैं तो तेरे साथ हूँ

दुःख में मैं ही सुख में मैं ही और तेरे मैं में मैं ही
कर रहा जो कर्म प्रतिक्षण उसके निमित्त में भी मैं ही
प्रेम मैं ही भाव मैं ही भक्ति मैं ही शक्ति मैं ही
मैं हूँ तुझमे तू है मुझमे वासना की ज्योति मैं ही

सौभाग्य मैं दुर्भाग्य मैं विश्वास मैं उपहास मैं
ज्ञान मैं अज्ञान मैं दृष्टान्त मैं व्याख्यान मैं
स्वांस मैं उच्छ्वास मैं गणवेश मैं परिवेश मैं
आवेग मैं संवेग मैं और तुझमे मैं ही मैं

खुद को गर पहचान तू तो मैं तो तेरा दास हूँ
माया के बंधन में बंधा तू फिर भला मैं क्या करूँ
कर रहा उत्थान तेरा मुझको पिला दे तू हला
जीवन मरण के वार से तुझको परे लेकर चला

कर मेरा संधान साथी वासना को तू भुला
जीवन सफ़र में सारथी बन मैं तेरे पथ पर चला

प्रसून सिंह “विभक्त”

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