न्यारी माँ

चरणों मे मॉ के तीर्थो का धाम।
ऑंखो मे पुरी विश्व का जाम॥
ना कर मॉ को कभी भी निराश।
बैठी सदा लगाए तुझसे कुछ आश॥
जिसने तुम्हे दुख और कष्ट से पाला।
लगायी तुम्हारे गले मे विश्व की माला॥
देना कभी ना गिरने इस माले को।
जिसने पाला तुम जैसे वाले को॥
तेरे शरीर का उजरा सब घाव ।
बन जाती थी उसकी बड़ी तनाव॥
ऑखो में बुंद लिए है सहरा कर ।
दिल मे लिए है हाथ अधरा कर॥
जब आती नही थी निंद हठोरी।
तब मॉ सुनाती थी प्यारी लोरी॥
कर सदा उसकी चर्णो का सेवन।
ओर कही ना मिलेगी तुमको मेवन॥
चर्णो में मॉ के ईश्वर का निवास।
मिलेगी न कहीं तुम्हे इस जैसी वास॥
मॉ बनती है सदा पेड़ की छाव।
मिट जाएगी तुम्हारी सभी घाव॥
मॉ का अर्थ होता ही है भगवान।
करना सदा पूजन इसी को जान॥

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