“बारात परिछन- गीत”

राम जी चले न विवाहन रुन झुन बाजेला।
अरे! उपरही सगुन मड़राला हमहूँ जइबें व्याहन॥
धावा तुहीं नउआ से बरिया अवध पुर के पण्डित।
राम जी चले न विवाहन रुन झुन बाजेला।
अरे!उपरही सगुन मड़राला हमहूँ जइबें व्याहन।2॥
पण्डित ૠषि आगे खबर जनावा कहाँ दल उतरी?
ऊँच नगर पुर पाटन अउर बाँसे बा छाजन,अरे!
झिर-झिर बहेले बयार वहीं दल उतरी।
झिने झिने कपड़ा पहिनें सासु त राम के परिछन चलें।
राम जी चले न विवाहन रुन झुन बाजेला।अरे!
उपरही सगुन मड़राला हमहूँ जइबें व्याहन॥
झुन झुन झुमका सासु के झुनके त राम के परिछन चलें।
अरे! मैं केकर आरती उतारूँ कवन बर सुन्दर!
साँवरे बर न हउअय राम त पीला पीताम्बर ओढ़ले।
अरे! मैं उनहीं के आरती उतारूँ उहै बर सुन्दर।
राम जी चले न विवाहन रुन झुन बाजेला।
अरे!ऊपर सगुन मड़राला हमहूँ जइबें व्याहन।2॥
शव्दार्थ:-उपराही- ऊपर, बढ़कर, श्रेष्ठ। ऊँच- ऊँचे स्थान में, ऊँचाई पर,श्रेष्ठ। परिछन-परछन,परिछे।
झिर झिर-मंद मंद, धीरे धीरे। बर- जिसका विवाह हो रहा हो। उहै- वही। केकरे-किसका।
नोट- दूल्हे की वारात दुल्हन के घर द्वारपूजा पर पहुँचने पर गीत।

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