गजल -बह रहा है जो दृगो से नीर उसको रोक दो |

बह रहा है जो दृगो से नीर उसको रोक दो |
ठग न विश्वामित्र जायें मेनका को टोक दो ||

पिंगला की प्रीति बदली जान लो ये भर्तृहरि |
राज्य औ नृपनीति को अब ज्ञान का आलोक दो ||

प्राण दशरथ के गये थे कैके’यी मानी नहीं |
प्रेम अन्धा है सदा से राम को मत शोक दो ||

सेज तारों की सुहानी देख कर बिधु सो गया |
उर व्यथा की रागिनी को त्याग तुम भी कोक दो

प्रेम शाश्वत सार है शिव प्रेम घोलो भक्ति में |
भक्त बनकर भक्ति करके भक्ति को ध्रुवलोक दो ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
९४१२२२४५४८

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  1. rakesh kumar राकेश कुमार 16/06/2014

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