अबला नारी

काश ये बदन मेरा
इतना कमजोर ना होता
ना होती ममता की मूर्त
उदर शिन्धु सामान ना होता

ना होती मैं बोझ किसी पर
मुझे घर भी बदलना ना पड़ता
ना होती मृदु सी कोपल
छुपकर निकालना ना पड़ता

सहारे ढूंढ़ती मैं दुख्यारी
ना इतनी बेचारी होती
आबरू के बोझ की ना
इतनी लाचारी होती

काश ये आवाज़ मेरी भी
थोड़ी सी भारी जो होती
तो शेर पर आज देवी सी
बैठी हर नारी ही होती

ना होती शर्म हया मुझे
ना मर्यादाओं को मै ढोहती
तो ना लुटती बन्ध कमरों में
ना छुपछुपकर मैं रोती

मैं बन जाती प्रचंड प्रखर
तड़ित कभी उज्जवल ज्योति
काश मैं दूध सी निर्मल
अबला नारी ना होती

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