तेज़ाब से

पूरे कालेज में इसे बैठने
की जगहं मिलती नहीं
लोगों को देखकर चलती
रास्ता देखकर चलती नहीं

बस दर्द ही दर्द है रहा
अब इसके जीवन में
जाने कितनी पीड़ा भर दी
इसके नाजुक मन में

लोग आजकल इससे
चेहरा फेर लेते है
और कुछ इसे हमदर्दी
से घेर लेते है

इसकी सिसकियाँ अब
रोकने से रूकती नहीं
एक हशती खेलती लड़की
आजकल बहार दिखती नहीं

जो जाती थी कभी
किताबे सीने से लगाए
आजकल जाती है चेहरा
आँचल से छुपाये

घाव तो इसके
दुखते नहीं अब
बस आंशू है की
रुकते नहीं अब

पूछता हूँ तो कहती है
मेरा जीवन ही मिटा दिया
एक मनचले ने चेहरा मेरा
तेज़ाब से जला दिया

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