“इतिहास रो रहा था!”

प्राची! इतिहास रो – रो कर शान्त हो रहा था।
बेटी-बेटों के फर्क में का देश सो रहा था॥
दुधमुहें तड़पते भटकते आँखों के आगे जल रहे।
रंगमहल मखमल लगल नयन प्रखर चल रहे॥
क्या माता से भी तुझे सरोकार नहीं रहा है।
दूध सा वह खून से भी प्यार नहीं हुआ है॥
तेजाबी लोगों की वातों की जलन में जल रहे हैं।
लोग सर झुकाये ? नजर छुपाए ? चल रहे हैं॥
क्यों शान्ति के नगर में विघ्न घुली जा रही है।
कोई! शहर अफवाहों के रंग में रंगी जा रही है॥
बागियों के हौसले मजहवी रंगी जा रही है।
वह खामोशी थी गावों में ठगी जा रही है॥
को जानता था दुश्मन गले मिला करते हैं।
ओ! आप के खातिर आतंक किया करते हैं॥
देखा इ भारत हौ इहै भारत को गान कहा करते हैं।
इहाँ बड़े-बड़े अपराधी खुद को महान जहाँ कहते हैं॥

Leave a Reply