गजल -समन्दर दर्द जो जागे

समंदर दर्द जो जागे सुनामी पीर आती है |
बहे जब बाढ़ का पानी रवानी रंग दिखाती है ||

सियासत की गली गन्दी किया जिन हुक्मरानों ने |
सियासत बेरहम होकर उन्ही को ही मिटाती है ||

जहाँ पर बेरहम हाकिम दिखाते हों कहर अपना |
वहां जनता जनार्दन चक्रधारी को बुलाती है ||

तपिस से पीर पर्वत की पिघल जाए ये मुमकिन है |
सुधर जाओ सितमगर तुम रवानी सब बहाती है ||

सहन करने की क्षमता भी है निर्धारित सुनें जालिम |
सहनशक्ती अगर कोपे तो काली खिलखिलाती है ||

हमारी आह से भी आग लग सकती सियासत में |
बचेगा तख़्त क्या तेरा ?अनल सब कुछ जलाती है ||

बताता शिव सभी को है सियारों को मिली गद्दी |
न समझो मूर्ख जनता को ये सबको आजमाती है ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9412224548

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