नारी उत्थानं

मैं नारी आतुर हूँ
हरदम तुझे बनाने को
हर पल तेरे साथ चलूँ
तुझे ऊपर उठाने को

तुम कमजोरी समझते हो
शर्म से पलकें झुकाने को
ममता को मजबूरी शमझा
बहाना हाथ उठाने को

बदायूं में मारते हो
और कभी दिल्ली में
पीसते हो नारी को
वर्चस्व की गली गली में

रहनुमा रही हूँ मैं
पुरूषों के अस्तित्व का
कलियुग में इम्तिहान
कैसा नारी सतित्व का

दूध को तुमने लजाया
और नींद मेरी रातों की
याद नहीं आता तुम्हें चलना
और शिक्षा मेरी बातों की

क्या यही पुरूषार्थ तुम्हारा
यही नारी उत्थानं है
बनाने वाली को लूटता
कैसा ये इन्शान है

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