साहित्य रत्न

ये शांत पुस्तकालय का
दूर तक फैला सन्नाटा
पुलकित प्रकाशित ज्ञान से
जन्मों का अन्धेरा मिटाता

कामायनी रखी कहीं पर
गोदान कहीं गीतांजलि
आनंदमठ ,सत्यार्थप्रकाश
टीकाएँ कहीं शब्दावली

कहीं निराला कही पंत जी
प्रेमचंद की कहानियाँ
कहीं गुप्त कहीं चतुर्वेदी जी
समाज की बंद निशानियाँ

कहीं पतन कहीं उत्थान
कहीं झूझ रहा इन्शान
राष्ट्रप्रेम कही अनुराग बहुत
कहीं प्रकति का गुणगान

बच्चन हो या महादेवी वर्मा
बंकिम, ठाकुर या दिनकर जी
जगा रहे हैं त्रस्त समाज को
किताबों में बंध होकर भी

प्रेमरस और माधुर्य घोला
वातसल्य हमारे जीवन में
उदगारित किया सत्य को
साहित्य के कण कण में

इन साहित्य के रत्नों को
“राकेश” का शत शत प्रणाम
इनके मार्गदर्शन में लाएंगे
हम धरती पर आश्मान

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