माँ

बहुत छोटा सा अक्षर है -माँ
मगर,
हर रिश्ते से ऊपर है ;
क्योंकि –
इसके दिल में,
ममता है ,
वात्सल्य है ,
दुलार है ,
इसकी आँखों में-
प्यार की सौगात है ,
मिलन की आस है ,
बिछुड़ने का दर्द है ,
इसकी जबाँ पर –
स्नेह की छाँव है ,
मिठ्ठी झिड़की है ,
सन्तान का नाम है ,
इसके हाथों में –
भोर का कलेवा है,
सुबह की रोटी है,
शाम का भात है ,
ताउम्र इसने क्या किया ?
कभी दूध पिलाती है,
कभी खाना सिखाती है ,
कभी चलना सिखाती है ,
कभी लिखना सिखाती है ,
सन्तान की ख़ुशी में खुश होती है ,
संतान के दुःख में आँसू बहाती है ,
देरी से घर लौटने पर चोखट पर डोलती है ,
मन्नते माँगती है कभी मन्दिर में ,
दुआएँ माँगती है कभी मस्जिद से ,
कभी नजर उतारती है,
कभी राई-नोन उवारती है,
संतान के सुख के लिए ,
सर्वस्व लुटाती है।
सन्तान इसके ऋण को
उतारे या ना उतारे ,
इसके मुख से हमेशा
दुआ ही निकलती है ,
दुआ ही निकलती है।

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