वो चान्द्नी रात

अन्धेरी रात को जब हम बेठे
समुन्द्र किनारे

हो रहा था जब लहरों का नृत्य
एक मीठी झंकार स्वरों का वे सत्य
कानों में जैसे कर रहा हो भवंरा बाँवरा

झुन झुन झुन झुन
गुन गुन गुन गुन
अचानक एक हवा के झोंके ने जब हिला दिया हमें
उछली वो लहरों की बून्दें
हाय ! पोंछा हमने अपना चेहरा
ऊपरसे जब पानी पर झुक्कर देखा
तो लगा ऐसा जैसे ये संसार है इक दर्पण
हाँ यही है सृष्टि का सत्य समीषर्राI
सृष्टि का सत्य समीषर्राI ?
या है मानसिक निजिकरण ?
इन्हीं विचारों में जब बैठ गए हम
जैसे बैठी हो जलपरी जल में गुमसुम

जब बैठे हम भी चन्द्र की गोद में
तो हंसते-हंसते आए सितारे

झोली मे मानो रंग बिरंगे मोती बिखारे
जैसे हों समुन्द्र में उच्छले
कण -कण
जैसे नवदुल्हन बाँधकर घुँघरू
चले , छ्मक छमक
फिर दिल पुकार उठा !

चाँद सितारो इक बात बताओ…..
मुँह मोड़ के ना जाओ
इतना न सताओ !

रोज़ आवें हम नील गगन पर
बातें करने मीठी मीठी
आ जाओ ना, हम सब खेले आँख मिचौली
लुक्का छुप्पी
खेलें लुक्काछुप्पी हम
झिलमिल झिलमिल हिलमिल जाँए
जैसे रिमझिम रिमझिम बरखा बरसे
लेकर सबको गोद मे अपनी
हमने देखा ऊपर तो चाँद मुस्कुराया
जो हो बिखरा रहा प्यार का हसीं साया
हमने भी थोडा दीदार किया
अचानक आई हँसी हमें
थोड़ा जिगर में ग़म भी समाया
अचानक फिर चन्द्रमा की चाँदनी में छिप गए हम
अन्धेरी रात और फिर समुन्द्र का किनारा
ये चन्द्रमुखि है या चाँद का पिटारा
ठीक ही कहते हैं जब बादलों ने उठाया घूँघट
तो निकला अन्दर से चाँद

आ हा ! क्या आफ़ताब
क्या बेताबी क्या रौशन चेहरा !

-रीटा फ़िरोज़पुरी

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