तेरी मधुशाला

बेशक रंग दिखाई दे
चारों तरफ यहां
बहारों के लिए फूलों को
खिलना ही पड़ता है

हाशिये पर बैठे रहो
मज़बूर होकर तुम
मंजिल पाने को राही
चलना ही पड़ता है

कद बढ़ाओ बांधकर
मखमल पैरों में
काबिलियत के लिए छालों
को निकालना ही पड़ता है

कितना भी डूब जाए
सूरज साँझ में
रोशनी के लिए फिर से
उठना ही पड़ता है

कूबत बेशक ना हो
जिस्म में लेकिन
शाहीलों के लिए समुद्र
से लड़ना ही पड़ता है

अजीब है दस्तूर
दुनिया के हजूम का
रचने के लिए पत्थर पर
घिसना ही पड़ता है

क्या करूँ आकर
तेरी मधुशाला में साकी
उतना नशा नहीं जितना
चाहत से चढ़ता है

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