किशान

चूँकि हम बड़े
हो गए
सफ़ेद लीबाज में
खड़े हो गए

तालियां बजती है
वाहवाही पर
खर्च बहुत है
आवाजाही पर

सोचा है कौन
हमें खिलाते
खेतों में अपना
पशीना बहाते

पत्थर जमीन पर
हल चलाते
कीचड़ में भी
कमल खिलाते

आज धुंधली है
नजर उसकी
टूट गई है
कमर उसकी

पेट हमारा
खूब मोटा है
खिलाने वाला
भूखा सोता है

जवान हो गयी
बिटिया उसकी
टूट गई है
खटिया उसकी

इनके पशीने से
क्या होता है
रोज़ रेत में
मिलता रहता है

कौन गिनेगा
इनके छाले
साहूकार हम
बड़े घर वाले

गोदामों में अनाज
सड़ता रहता है
और किशान
कुढ़ता रहता है

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