गोधूलि

पानी सी निर्मल तुम
जाती हो पलकें झुकाये
सिमट गई सारी दुनिया
जब तुमने कदम बढ़ाये

रंग चुराकर तितलियों का
तुमने अपने लिबाज बनाये
मिली हो जैसे धरा नभ से
हया चेहरे पर जब आ जाए

मंद मंद मुस्काती तुम जैसे
कली आधी खिल जाए
अल्ल्हड़ सी तुम शर्माती
जैसे नदी कोई बल खाए

काज़ल लिया बादल से
स्वर्ण से हैं अंग बनाये
मेहदी सी उजली तुम
जैसे कहीं दीपक जल जाए

आखों में छिपाए मोती जैसे
कहीं शीप में बंद हो जाए
गोधूलि सी मिलने आओ तुम
तो मन को चैन आ जाए

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