नीलकंठ

कहते हैं की सोच
समझकर लिखूं मै
ऐसा बनकर चलूँ
की अच्छा दिखूं मै

मस्ती झरनो की
शिर्फ़ कोलाहल है
शोर या मस्ती में
किस को चुनू मै

मुद्दतों से चलकर
मंजिल पर पहुंचा हूँ
लुटेरों के बीच
सर अपना धुनु मै

आका मेरा बड़ा
मतलबी है
जज्बातों या दिल में
किस की सुनु मैं

आज भी मुझमे इतनी
तो गरत बाकि है
जहर बाटने वालों में
नीलकंठ बनु मै

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