ठोकरों से

काश कुछ तो मन का
वहम मिटाता मै
कुछ तो इंसान
होने का धर्म निभाता मै
इतना बड़ा गम मै
पी नहीं सकता
ज़िंदा होकर जिन्दंगी
अपनी जी नहीं सकता
इससे अच्छा
पत्थर बन जाता मै
ठोकरों से लोगों को
कुछ तो सिखाता मैं

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