रोशन ये गुलिस्तां रहे

रूद्र अवतरित रूह अपनी
हर दिशा है डोल रही
माटी के बेटों की कहानी
गली गली है बोल रही

संगीन है रंगीन अब
मुहं पर रक्तचाप लिए
मुट्ठियाँ भींच गई लो
दुश्मन गले का नाप लिए

भूख प्यास आंधी तूफ़ान
कुछ ना रोक पाया अब
नरमुंड से पट गई धरती
खडग हमने उठाया जब

अब इस पुण्यभूमि पर
न कोई चीत्कार होगी
बाते बहुत हुई अब
यलगार की हुंकार होगी

अपनी टोपी पर रखे
बड़े बड़े तख्तो ताज यहां
इन पैरों ने हैं कुचले
राजाओ के राज यहां

कितनी उजड़ी हैं कोख
देह लहू लुहान लिए
कट कटकर उठते है बेटे
ताकि रोशन ये गुलिस्तां रहे

One Response

  1. देवेन्द्र सगर 28/03/2015

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