किनारा

मन पर ऐसा अंकुश
लगाते हैं लोग
खाले फोन सा
घूमाते हैं लोग

थकते नही आनंद
के झोकों से
रिश्तों को कच्चा ही
चबाते हैं लोग

मै नहीं कहता कि
हालात बहकाते नहीं
पर दिल का फूल क्यूँ
नहीं खिलाते है लोग

तन्हा घुमंते हैं
लोगो कि भीड़ में
दुखडा अपना क्यूँ
नहीं बताते है लोग

नौचने लगे हैं
अपना दामन ही
खुद से खुद को क्यूँ
नहीं बचाते है लोग

मन तो होता ही है
सभी का पागल
पर आत्मा अपनी क्यूँ
नहीं जगाते है लोग

बेशक आदमी ढूंढ़ता है
सहारा तन्हाई में
पर ईश्वर को किनारा क्यूँ
नहीं बनाते हैं लोग

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