मारकर इंसान को

कागज़ों में उलझकर
रह गया इंसान देखो
मुठियों में आ गए
बड़े बड़े मुकाम देखो

छोड़ दिया मुस्कुराना
फूलों को देखकर
कागजी हो गई
फूलों की दूकान देखो

हट गया मिट्टी का चखना
मिट्टी के मकान देखो
ऊँचे ऊँचे घरोंदे खड़े है
पड़े है सुमसान देखो

कुछ जहर सा घुल गया
कलुसित हो गयी जुबान देखो
मर्यादाएं बेचकर हमने
सजाएं हैं कब्रिस्तान देखो

दया प्रेम सम्मान रहित
हुआ ये जहाँ देखो
टकसालों में गिरवी पड़ा
धरम और ईमान देखो

पाने की चाहत हो गयी
अब इतनी अंधी
मारकर इंसान को
खा रहा है इंसान देखो

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