मैं रोज सुबकता हूँ

मैं बहुत मैला
हरवक्त रहता हूँ
उठना है बंदिशों से
हररोज कहता हूँ

मन भी मेरा हालातों
संग बदलता है
हालातों को ही
मैं जिंदगी कहता हूँ

पिंज़ड़ों से निकलने
को जी चाहता है
जाने कितनी मौत मैं
रोज मरता हूँ

कोई मेरा साथी नहीं
तो कोई गम नहीं
पर खुद से रुसवाई
मैं रोज सहता हूँ

मादा तो था हालातों
को बदलने का
सुलझाता हूँ जाल को
तो और उलझता हूँ

आँशू कभी बहाऐ नहीं
मैंने जख्मों पर कभी
पर तन्हा रातों में
मैं रोज सुबकता हूँ

2 Comments

    • rakesh kumar rakesh kumar 12/05/2014

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