अपनों का भी भरोषा नहीं

अब दुनिया हुई खराब
दूध से जयादा शराब
तीखे से तेवर अभी
बेसर्मी के जेवर सभी

अँधा हो गया राजा
पैसा हो गया ख़्वाजा
लाचार है गरीब आज
विनाश है करीब आज

जिम्मेदार करते किनारा
चोरों के हाथ चौकेदारा
अधनंगा हो गया समाज
गिर गई छोटे बड़े कि लिहाज

ईमानदारी नाशूर हो गयी
नेकी जैसे काफूर हो गई
बहरे लगे ढोल पीटने
शिक्षित लगे टांग खीचने

बढ़ने लगी मेहरबानियाँ
नारी कि परेशानिया
लूटते है पहरेदार अब
चाहत बनी बाजार अब

मान सम्मान बचाऊँ कैसे
अब गर्दन ऊठाऊ कैसे
जिंदगी का अंदेशा नहीं
अपनों का भी भरोषा नहीं

2 Comments

  1. mahendra gupta 10/05/2014
    • rakesh kumar rakesh kumar 12/05/2014

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