राधाकृष्ण

कौतुक हरि राधा को हरि।
ललचावत सुरवृन्द चहत वृज जन्म लेहि एक वेरि॥
बनि बनि सखा चरावे गैया लावे वन के फूल।
वनमाला रचि के पहिरावे दोउ को सुख भूल॥
गावे नाचे और बजावे खजरी उफ करताल।
वन्सी धूनि सूनि वलि वलि जावे छवि लखि होय नेहाल॥
तुच्छ गिने सब स्वर्ग सुखन को यह वृज सुख के आगे।
जन्म जन्म तुअ दास होय यह नित सरोज वर मांगे॥

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