मानुष जन्म महा दुखदाई

मानुष जन्म महा दुखदाई ।
सुख नहिं पावत धनी रंक कोउ कोटिन किये उपाई ।
रोग सदन यह तन मल पूरे छन में जात नसाई ॥
आशा चक्र बँधे बिन मारग दिवस रैनि भरमाई ।
पापिनि शापिनि चिन्ता व्यापे घेरि डसत नित आई ।
विषै से सुखत देह और जग कन्टक सम दरसाई ॥
मातु पिता दारा सुत दुहिता मित्र बन्धु गण भाई ।
खान पान लागत नहिं नीको प्रिय अप्रिय भय जाई ॥
हरि स्तुति के सार एकही माया जाल छोड़ाई ।
भजहु ‘सरोज’ नन्द नन्दन पद त्यागि कपट कुटिलाई ॥

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