धरती के मनुष्य पर उपकार

धरती के मनुष्य पर उपकार

सरल नही अबोध है ये धरती

इस पर जो जन्माओं व देती सोना धरती

नील अंम्बर की छबियां पर रह गुजर करती धरती

पल-पल जिनकी भूख मिटाती प्यास बढ़ाती प्यास बुझाती धरती

रहते जम्में की परोपकारी माता बच्चों को हर पल सीने से लगाये धरती

चंदन सी खुशबू माथे पर लगाते सारे शीश उठाये जैसे धरती

सारे जगत की पेरॅंवी व करती कभी व रोती कभी न सोती धरती

सुख-दुख में साथ रहती सबके जीवन न्यारे-प्यारे करती धरती

जीवन को सुख का आधार बनाओ साथ निभाओ मिल-जुल करके कहती धरती

सरल नही अबोध है ये धरती

रक्षा करते तुम ना घबराना चाहे आन-बान मिट जाये वीर जनम देती धरती

उड़ते मिटते धूल-कण बन जाना सदा सुहागन बनी रहे ये खेत धरती

बनना-मिटना बना रहे स्वर्ग यहाँ वीर गाथाओं का मेला लगाती धरती

हमको जीवन देती है दाती पालन-पोषण भी करती है धरती

नया आयाम नया कीर्तिमान बनाती हमको धरती

जीवन पूरा हो जाने पर कर देती पंचतत्व मे लीन ये धरती

वापस सबने दिया है दाती को जिसने जीवन लिया धरती पर

तप ऋषि-मुनी गुणगान किये युग मे पु़त्र अपराध क्षमा हुये यहाँ

सरल नही अबोध ये धरती ।

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  1. kuldeep 26/06/2016

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