एक खत

सोचा कि आज आपके नाम एक खत लिखूं। जज्बात का कलम लिया और अश्कों कि स्याही से भरकर तेरी याद लिखने बैठा पर लिखूं क़्या ये सोचता रहा, कहाँ से शुरु करूँ

क्या आज भी बिना किसी बात के रुठने कि आदत है ?
या तनहियों मे बैठकर अश्क बहाने कि आदत हैं
या अब भी बिना बताये ख्वाबों आ जाने कि आदत है
क्या अब भी मुझे देखकर शर्माने कि आदत है ?
या नज़रें मिलाकर नज़रें चुराने कि आदत है
क्या अब भी मेरी याद मे कुछ लिख जाने कि आदत है ?
या घंटों तक मेरी तस्वीर से बतियाने की आदत है
या अब भी सहेलियों से मेरी हि बातें करती हो
या अकेले मे बैठकर मेरे बारे मे सोचती हो
बरसों पुराने खतों को क्या अब तलक भी पढ़ती हो
या मेरी कोई निशानी को अब तलक भी रखती हो
क्या मेरी पुरानी फ़ोटो को देखकर अब तलक हंसती हो
या मेरी आवाज का कैसेट सुनकर रो पडती हो
शरारत भरी वो आदतें, क्य अब जवान हो गई हैं
या अब भी बच्चों के साथ हंसी ठिठोली करती हो
क्या अब भी प्यार का इज़हार करते हुए घबराती हो
या बस मेरे नाम फकत खत पर गुजारा करती हो
तन्हाई मे सहारा कि तेरी याद मे अक्सर
खत तो बहुत लिखे मगर पहुंचा नहीं पाया
तेरे नाम खतों कि डायरी भी भर चुकी है
आज तक लिखे वो खत पहुंचा नहीं पाया

One Response

  1. kuldeep 26/06/2016

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