नदियाँ

नदियाँ तो हैं हमारी देश की आन बान और शान |
इनकी चंचलता को रोक मत करो इन्हें नाकाम |
ये तो प्रकृति की हैं अनुपम ईश्वरीय देन |
क्यों करते हो इनका लेन-देन ||
ये तो प्राकृतिक रूप में ही बहुत अच्छी लगती हैं |
अपनी सुंदरता को इसी रूप में कायम रखती हैं |
इन नदियों पर हे मानव बड़े-बड़े बांध मत बनाओ |
आओ इन्हे नैसर्गिक रूप से सजाओ ||
इनकी धाराओं को सुरंग में मत करो तुम परिवर्तित |
ये कर देगी तुम्हारे जीवन को आवर्तित ,
जल तो जीवन हैं |
यही तो हैं मानव के प्रति प्रकृति का समर्पण ||
इसकी धाराओं का मत करो तुम खण्डन मण्डन |
बिना जल के जीवन नहीं जीया जायेगा |
मानव तो जीते जी ही मर जायेगा |
नदियाँ तो हैं हमारे जीवन की अमूल्य थाती |
अब क्यों बना रहे हो तुम नदियों की बाती ||
नदियों की चंचलता तो सर्वविदित है |
प्राकृतिक सुधा से ही तो हमारी धरती आप्लावित है |
नदियाँ तो है जन जीवन की अमूल्य रक्षक,
इनकी धाराओं को रोक मत बनो तुम भक्षक ||

२०१० में प्रकाशित ‘नारी’ कविता संग्रह में से

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