कुण्डली

एक बाबा ले के चले,

कुण्डली अपने साथ में ।

आज उसमें लिखा है बोले,

है वो बड़े जोश में ।

आँख दिखा कर, कन्धा दबाकर,

बोला बड़े रौब से ।

पान खाकर, चुटकी बजाकर,

न आना मेरे सामने ।

दूंगा एक कान पे जमाकर,

सुन लो जरा गौर से ।

मेरे लिए तुम जल लाओ,

जाओ जरा दौड़ के ।

यों न तुम कंधे मटकाओ,

टकराओगे वर्ना मौत से ।

डींगें जो वो मार रहा था,

थे वो सारे खोखले ।

शरीर उसका बुढा गया था,

हालत थी उसकी दयनीय ।

सामने जो मौत को देखा,

होश उसके उड़ गए ।

कुण्डली में ये लिखा था,

बोला बड़े खौफ से ।

कुण्डली का सारा जोश था,

उसके नहीं कोई दोष थे ।

देवेश दीक्षित

9582932268

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