जागू जागू हो ब्रजराज

जागू जागू हो ब्रजराज ।
निशि पति मेला मलिन देखि निशि त्यागल अम्बर लाज ॥
तारागण सब छोड़ि पड़ैलिह, सखिक आचरण जानि ।
अपनो लोक संग त्यागै ए, अति अनीति अनुमानि ॥
प्राची दिशा भेट केर कारण, ऐली उषा सोहागिनि ।
पहिरि लाल पट दिनपति संगहि, रूपवती बड़ भागिनि ॥
पक्षीगण आनन्द मनावे, कलरव चारू सुनावे ।
अपन नृपति केर सुयश मनोहर, जनु दिस दिस में गावे ॥
विकसित ठाढ़ ‘सरोज’ अहुँ उठि कौतुक करू विचार ।
निशि जे त्यागल अम्बर तकरा भानु कैल अधिकार ॥

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