कलम

कलम

पकड़ता हूँ कलम जब मैं

तो ये शोचता हूँ अक्सर

क्या लिखूं अपने बारे में

क्या है मेरा मक्सद

अँधेरा लगा है हाथ में

उजाले की तलाश है

दूर कहीं मंजिल है

मगर दिखती वो पास है

किस भ्रम में जी रहा हूँ

मुझको खुद ये ज्ञात नहीं

उन सितारों को देख रहा हूँ

जो की मेरे पास नहीं

उन उम्मीदों का क्या करूँ

जो वक़्त के रेत की तरह बह गयी

और उन खाली पलों का क्या करूं

जिसमें आई कविता मेरे दिमाग से निकल गई

निकल गयी जो दिमाग से कविता

मानो अन्धकार छा रहा

दुबारा पनपेगी कब कविता

इन्तजार उसका कर रहा

इन्तजार ही इन्तजार रह गया

सपने में सपना रह गया

क्या करून में अब

उजाला हाथ में आते-आते रह गया

कल फिर सवेरा होगा

नयी उम्मीद को जन्म देगा

नयी किरण का रंग क्या होगा

न जाने अगला पल क्या होगा

जैसा भी हो अच्छा ही हो

यही उम्मीद करता हूँ

मंगलमयी अगला पल तुम्हारा हो

यही सुभकामनाएँ आपको देकर, मैं अलविदा लेता हूँ

देवेश दीक्षित

9582932268

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