मेरे मालिक

तू मुझमे इस कदर समाया
ये बहुत देर से समझ आया
जब जब सर झुकाया
तो खुद को तेरे करीब पाया
माना नहीं था तुझे कभी पहले
तूने खुद अपने दर पे बुलाया
ज्युँ ही पढ़ा तेरा कलमा
इस फ़कीर को चैन आया
तेरे प्यार से ये नहाया
तेरे नूर ने कुछ ऐसा जादू दिखाया
कि हर तरफ तू ही तू नज़र आया
बातें भी अब तेरे प्यार की
इबादत करुँ तेरे नाम की
कुछ ऐसा है तेरा असर
हर दर्द है अब बेअसर
तेरे नूर के ये सिलसिले
मिलते रहे अब उमर भर
इनायत तेरी गीतों में है
शिकवे नहीं अब दिल में हैं
तन्हाईयाँ महफ़िल सी हैं
न दूरियां अब दिल में हैं
पुकारता हूँ जब कभी
मैं बैठकर तुझको युही
होता हूँ तुझसे रूबरू
तेरी आशिकी मैं अब करू
दिन भर तेरा रोज़ा रहे
शामें मेरी इफ्तार सी
शायर भी अब बन गया
ये हौसला तेरे दर से है
साँसे मेरी अब हैं तेरी
बातो में तेरा रंग है
फासले अब घट गए
दर्द सारे मिट गए
माथे में ना अब शिकन है
धड़कन भी अब रिदम में है
तेरी है फिकर कुछ इस कदर
न अब रही कोई फिकर
हर रंग में अब तू ही है
न जंग कोई बस उमंग है
नस नस में एक तरंग है
ये असर भी तेरे संग है
ना धूप है ना छाँव है
खामोश अब में भीड़ में
हर और अब बस तू ही है
तेरे नूर से में निखर रहा
तेरा रंग मुझपे चढ़ रहा
तेरे प्यार की बारिश से मैं
भीगा हूँ यूँ कुछ इस कदर
लम्बा लगे न अब कोई सफर
तेरे साथ की अब रोशनी
राहें मेरी रोशन करे
राहें थी जो कुछ खुरदरी
लगती मुझे अब मखमली
जख्मों का न एहसास है
जब दर्द में तू पास है
हर कोई पूछे मुझसे अब
मुस्कान का क्या राज है

Leave a Reply