बुझता दीपक

बुझता दीपक

दीपक जब बुझने लगता है,

तड़पता है ।

फड़फड़ाता है,

लौ को और तेज कर लेता है ।

जैसे जोर से पुकारता हो,

कोई मुझे बचाओ ।

अपना हाथ बढाओ,

अँधेरा मत फैलाओ ।

ये शोच कर की,

आएगा कोई बचाने ।

पर बात है अफ़सोस की,

कि दुनिया स्वार्थी है ।

जब तक थी जरुरत,

थी प्रकाश की आवश्यकता ।

लिए हाथों में अक्सर,

घूमता रहता ।

अब बे-इंसाफी तो देखो,

एक पल में छोड़ गया ।

गुस्से में लाल दीपक अब तो,

दुनिया से रूठ गया ।

समाज की बे-इंसाफी ने,

दीपक का दिल तोड़ दिया ।

जलेगा और दीपक आगे,

यह कह कर अलविदा किया ।

आखिर दीपक बुझ ही गया,

अरमाँ लेकर टूटे हुए ।

आँखों में आंसू लिए हुए ,

दर्द लेकर चला गया ।

देवेश दीक्षित

9582932268

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