कलम पर एक मुसलसल ग़ज़ल

झूठ पर से पर्दा उठाती है कलमI
आयना सच्च का दिखाती है कलमII

जिन्दां की जुल्मत में मुज़तर हो चाहे,
नये जीस्त की शरर जलाती है कलमI

सितमगर हो चाहे कितना भी बली,
तख्तोताजों को पल में ढाहती है कलमI

जीरो से हीरो और हीरो को जीरो ,
किस-२ को क्या-२ बनाती है कलमI

चाहे पर्दे में छुपा के रखा हो कितना,
खोल कर परत-२ दिखाती है कलमI

बे-बाक़ तीरों में इसके बेताव बिजलियाँ,
मुर्दों में भी वलवला जगाती है कलमI

बे आबाज हो कर भी आबाज करती है,
बुलेटिन से बुलेट जब चलाती है कलमI

तलबारों से दिल पे नहीं राज होता है,
खला तक भी दूरियां मिटाती है कलमI

दवा में नहीं जो वह है इसमें करिश्मा,
टूटे दिल पे मरहम भी लगाती है कलमI

आए दर्द-ए-दिल’कंवर’न अगर जुवां पर,
उकेर कागज पर सुकूं पहुंचाती है कलमI

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