माँ-(शब्दाँजली)

माँ तुम तो मेरे तन मन में
तेरी यादें घर के कण कण मेंI
हुआ अकेला चाहे फिर भी
कभी लगा नहीं मैं निर्जन मेंI

मैं मुस्काया तू हँसी
जब मैं सुबका तू रोई
लोरी देते गाते गाते
सुन्दर सपनों में खोई
सूखा सूखा मेरे नीचे
खुद गीले पे सोई
खुद कांपती ठंड में पर
मुझ पर देती लोई I
माँ मुझ पर देती लोई I

धूप धूप सब अपने ऊपर
मुझ को देती छांब सदा
कह सके न कोई मुझ को
जो देती उसको डांट सदा
मेरे मन के भावों को
होंठो से पहले पढ़ लेती
दिल में पाले सपने को
पल भर में पूरा कर देतीI
माँ पल भर में पूरा कर देतीI

पापा के अरमानों को तू
मुझ तक सदा पहुंचाती
पर मेरी चालाकियों को
उनसे कभी न बतलाती
जीवन की भरी दोपहरी
के मद में जब मैं खोया
बहा बहा कर आँसू अपने
तूने मेरे पापों को धोयाI
माँ मेरे पापों को धोयाI

न मैंनें पूछा न तूने कहा
दुःख अपना कभी मुझ से
अपना सदा सुनाता रहा
गोदी में तेरी सिर धर के
जब मैं खोया दुनिया में
तू रहती मुझ में खोई
चली गई इस दुनिया से
सुध न लेता अब कोई I
माँ सुध न लेता अब कोई I

मैंनें सुना तू कुछ न बोली
बच्चों के दूर जाने के बाद
अपने में घुट घुट कर रहती
इतना गम खाने के बाद
दुनियाँ को जब देखा समझा
लौट आया तब तेरे आँगन
पर मुझ को दे कर आशीषें
छोड़ चुकी थी अपना उपबनI
माँ छोड़ चुकी थी अपना उपबनI

सूरज ढल गया शाम हुई
अब याद तुम्हारी आती है
अब भी माँ तुम शक्ति मेरी
सपनों में भी सहलाती है
गर्व -निहाल धन धान्य से
या हुई विपनता जीवन में
हुआ अकेला चाहे फिर भी
कभी लगा नहीं मैं निर्जन मेंI
माँ तुम तो मेरे तन मन में
तेरी यादें घर के कण कण मेंI

Leave a Reply