शायद लौट आये वापस वो पन्नों में…..

ना जाने उस कविता का रंग क्या था,
ना जाने उसका वो उमंग क्या था,
दिल ढूंढ रहा है आज उसे पुराने पन्नो में,
कहीं वो शब्द मेरे रूठे तो नहीं सितारों में.
जब रगो में रक्त नहीं शब्द दौड़ती थी,
जब सपनों में बस कविता ही बस्ती थी,
तभी वक़्त से कुछ पल चुराकर,
सँजोई मैंने वो कविता थी.
नब्ज चाहे कुछ भी कहे,
पन्नों में वो रहे ना रहे,
कल तक वो मेरा आज था,
आज बना वो मेरा कल है.
लिखे कई कविता हैं मैंने,
पर लगे,और उड़ चले वो गहने,
पर गुमसुम छिपा वो कविता था,
जो उड़ने से शायद वो डरता था.
अब बची हैं तो बस धुंधली साँसे उसकी,
कहीं नजर नहीं वो खुशबु केसर की ,
आज फॅसा पड़ा है वो मेरे मनो में,
शायद कल लौट आए वापस वो पन्नो में.

नितेश सिंह(कुमार आदित्य )

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