व्यंग्य- परक दोहे (राजनीति)

बाड़ खाय जब खेत को , मांझी    डुबाय नाव ।

उल्टी- गंगा  बह रही , ये कैसा बदलाव ।।

राजनीति  दोषी नहीं ,दोषी  खुद इंसान ।

करता  गलती जानकर  , फिर बनता अन्जान ।।

राजनीति जब से बनी , स्वार्थ-साधना तन्त्र ।

क्रिया सब उल्टी हुई ,विफल हुये सब मंत्र ।।

दहशत को आदर मिले ,स ज्जन को दुत्कार  ।

पीते   रहे  नाग  दूध , बीते  बरस  हजार  ।।

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  1. deveshdixit deveshdixit 11/04/2014

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