है अजनबी

है अजनबी ये जगह, है अजनबी ये सुबह,
है अजनबी ये धूप, एक अजनबी सा इसका रुप,
है अजनबी ये मौसम, अजनबी सी हैं हवायें,
है अजनबी ये एहसास, किसी अजनबी जहाँ के जज़्बात ।

ये जगह जिसे देख कुछ भी अपना न लगता है,
यहाँ की सड़कें, ये इमारतें, इनमें बसे लोग, उनकी चाहतें,
ये मोहल्‍लै और गलियाँ, ये निशब्द सी दिनचर्या,
यहाँ की भीड़, भीड़ में अनगिनत चेहरे, उन चेहरों पे फैली वो कृत्रिम मुस्कान…
सभी हैं कुछ अनजाने से, अलग, बिल्कुल बेगाने से,
फिर भी हैं हम यहाँ, ढूंढने एक नया मकाम ।

ये सुबह जिसके होने में, है तो अपने ही वहाँ वाली बात,
वही केसरी धूप की किरणें, चिड़ियों की गूँजती चहचहाहट,
वही ओस की बूँदों से झिलमिलाती, सीलि हुइ हरी घास,
फिर भी कुछ कमी सी लगती है, कोइ बात कहीं तो खलति है…
सभी हैं कुछ अनजाने से, अलग, बिल्कुल बेगाने से,
फिर भी हैं हम यहाँ, ढूंढने एक नया मकाम ।

ये धूप जिसकी रश्मियों का, रंग कुछ और ही है खिला,
इस श्‍वेत, स्वर्णिम रोशनी से, है हर कोना उजला उजला,
उन्हीं पेड़ों की शाखाओं और पत्तों की छलनि से निकल,
ये धूप करती है वही अठखेलियांं इस धरती पर,
फ़िर भी किसी के न होने का एहसास दिल में चुभता है…
सभी हैं कुछ अनजाने से, अलग, बिल्कुल बेगाने से,
फिर भी हैं हम यहाँ, ढूंढने एक नया मकाम ।

ये मौसम जिसे जानते हम हैं वहीं के नामों से,
वही सर्दी तो है जिसे वहाँ गुलाबी कहा करते थे,
पर यहाँ उस सिहरन को पहचान क्यों न पा रही हूँ मैं,
वही गर्मी भी है जिसके संग बहती थी सुसुम पुरवाइ,
पर यहाँ उसकी तपिश से तन क्यों चिलचिला सा जाता है…
सभी हैं कुछ अनजाने से, अलग, बिल्कुल बेगाने से,
फिर भी हैं हम यहाँ, ढूंढने एक नया मकाम ।

ये एहसास जिसे पाने को, हैं कितने ही वहाँ वाले तत्पर,
इसी होड़ में हैं लगे हुए, छोड़ घर परिवार और रहबर,
हम भी उन्हीं में से एक हैं, वहीं से आये हैं निकल,
जाने अनजाने होकर भी चल पड़े हैं अजनबी राह पर,
अपनाने अजनबी रुत को, अपनी फ़िज़ायें छोड़ कर…
सभी हैं कुछ अनजाने से, अलग, बिल्कुल बेगाने से,
फिर भी हैं हम यहाँ, ढूंढने एक नया मकाम ।

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