वक्त का कोहरा

खिलखिलाती सी मेरी ज़िन्दगी बस दौड़े जा रही थी …।
मन में दृढ संकल्प, आँखों में सपने और उन्हें पूरा करने कि चाहत लिए,
बेबाक ही दौड़े जा रही थी अपने लक्षय कि ओर.……।
राहें अन्जानी पर खूबसूरत थी
लोग मिलते गए, कुछ बिछड़ते गए
कुछ साथ चले,
अब ज़िन्दगी अकेली न थी.……

पर अचानक एक दिन खुदको अकेला पाया,
राह में जाने कहाँ से घना कोहरा घिर आया.…।
अब चेहरे पर ख़ुशी कि खिलखिलाहट नहीं ,
भय के बादल छाये थे…।
दिशाहीन आँखें अब राह तलाश रही थी.…।

उफ़ ! कुछ भी नहीं दिखता है…..
किस ओर चलूँ नहीं सूझता है….
क्या कोई है जो मुझे राह दिखाए ?
देखो, समय बीत रहा है,
मुझे भी अपने लक्ष्य कि ओर बढ़ना है………..
पर करूँ क्या नहीं सूझ रहा है…..।

छोटे छोटे कदमो से जाने किस ओर बढ़ रहा हूँ.………
आँखों को फाड़े जैसे राह ढूँढ रहा हूँ.……
बहुत से काम हैं बाकी जो करने हैं…….
अधूरे हैं जो सपने वो पूरे करने हैं.…।

हे ईश्वर तू जाने कहाँ सोया है…….
देख मैंने खुदको आज कहाँ खोया है.……
हाथ पकड़ मुझे साथ ले चल.………
इस घने कोहरे के मुझे पार ले चल.……!!!

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