कुछ तो ख़ास है उसमे

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

कभी नज़दीक आती है कभी दूर जाती है

कभी नज़रें मिलाती है कभी नज़रें झुकाती है

कभी महफ़िल में आती है बड़ी रोनक सजती है

कभी तनहियों में रहके भी दिल को लगाती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

कभी रोटी है गम में वो कभी फिर मुस्कुराती है

कभी खुद रूठती है तो कभी मुझको मानती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

ग़मों को यूँ छुपाती है कि जैसे कुछ नहीं मालूम

कभी वो खुद भी हँसती है कभी सबको हंसाती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

कभी बेफिक्र होकर बस यूँ ही बात चित करती है

कभी खामोश होकर कुछ भी न वो बोल पाती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

शरारतों पे जब आये तो बच्चों से भी आगे है

कभी मासूम बनकर के फकत बस मुस्कुराती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

कभी सबकी उदासी को भगाकर के हंसाती है

कभी तन्हाईओं में बैठ कर आंसू बहाती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

कभी वो फूल बनकर के मेरे घर को सजाती है

कभी मुस्कान से अपनी मेरे सब गम भगाती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

जुदा होकर भी मैं उससे जुदा ना रह कभी पाया

कभी ख्वाबों में आती है कभी सपनो में आती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

कभी तन्हाईओं में बस मेरी आँखें बरसती है

यहाँ नॉएडा में “शक्ति” वो जब भी याद आती है

कुछ तो बात है उसमे, कुछ तो ख़ास है उसमे

(Written By Shakti)

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