मेरी उलझन को सुलझाओ तुम –

इस ओर रहूँ कि उस छोर गहूँ,
मेरी उलझन को सुलझाओ तुमI

चहुँ ओर बिजलियाँ मेघ घनेरे,
उद्विग्न उच्छृंखल मन को मेरे,
जाग्रत उद्यत निर्भय निर्मल
कर दिव्य राह दिखलाओ तुमI
मेरी उलझन को सुलझाओ तुमI

वाह्य चक्र के छोर कक्ष में ,
भ्रमित मन कण निज अक्ष में,
अंत: चक्रवात के शून्य में,
किसी युक्ति से पहुँचाओ तुमI
मेरी उलझन को सुलझाओ तुमI

दिशाबिहीन चप्पू बिन भरमाती,
कभी ऊपर नीचे हिचकोलें खाती,
मेरी फंसी भँवर में नैया को,
साहिल पर पार लगाओ तुमI
मेरी उलझन को सुलझाओ तुमI

प्रछन्न मायावी पाश में उलझे,
मन की जटिल गाँठ न सुलझे,
अलौकिक कोई रश्मि दे कर,
इसे सत्वर मुक्त कराओ तुम I
मेरी उलझन को सुलझाओ तुमI

मिथ्या ओट से तुम्हें नजर कर,
गाता गीत अपने ही राह पर,
एकाकी बैठा अहंकार शिखर पर,
प्रस्तर आसन तोड़ गिराओ तुमI
मेरी उलझन को सुलझाओ तुमI

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