धौलाधार शत शत मेरा तुम्हें नमन

तू गौरवमयी विशाल अचल
चिंदी चिंदी सी हुई ओढ़े बर्फ की चादर
जब लश्कें भानु शशि तेरे खखरे तन पर
दिखता आवरण धवल धवल
साँसे रोकता अपलक आरोहण
पग बांधता द्रुत अवरोहन
देख तुझे पिया मेरा मन
रहता सदा शांत सम्पन्न
तेरी सुंदर मालाओं का क्रम
देता सदा संदेश यही
कि शनै: शैने: जीवन पथ पर
चित अटल अपलक बढ़ो
मंजिल वेशक दूर सही
पग पग मापो सोपान चढ़ो
न होंगे तुम कभी विकल विपन
बस रमता तुझ में मेरा मन
सहमी पवन जब सूंकती दोड़े
अटके-भटके तुझ में
होती निशा की नीरवता
तब खण्ड-खण्ड
आंसू उसके तब ठरते ठरते
जम जाते तेरे हर कण कण
प्रथम किरण जब उषा काल की
तेरा भाल चूमती
टप टप तब वह ढरते जाते
बन के शबनम
फिर बन के धारा निश्छल जल की
तेरे चरणों से बहती जाए
करके छल छल छल
घाटी को पल्वित पुष्पित करती
देती उसको नित नव जीवन
धन धान्य से परिपूर्ण
समृद्ध होता असम समतल
तेरी अलौकिकता का मैं रसिक
नैसर्गिक शून्य में लगता मन
मुझ को तेरा दिव्य दर्शन
समझाता जीवन का नव दर्शन
बस रमता तुझ में मेरा मन
चाहूँ यही शैल अंश बन कर
रहूँ तेरे अशून्य में
सदा शून्य सा बन कर
रहूँ देखता तेरी बिछाई
कहीं सपाट कहीं सिलबटों भरी
कहीं रूखी सूखी कहीं हरी भरी
कहीं टेढ़ी मेढ़ी नीली लकीरों उकेरी
इक चादर सी
इस घाटी में दूर क्षितिज तक
शोभित अक्षुण सौन्दर्य से
इक इक बानें जिसकी
जो देतीं मुझ को सुख परम अनन्त
तन में होकर भी न जानू
हो जाता में क्यूँ अतन
रहूँ सदा मैं लिपटा तेरे
बस पग पावन
शिव भूमि के हे!मन भावन
शत शत मेरा तुम्हें नमन
शत शत मेरा तुम्हें नमन I

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